દરેક ક્ષેત્રમાં ઝડપથી બદલાતી દુનિયા સાથે કદમ મિલાવવા માટે નવી અને અદ્ભુત માહિતી જાણવી એ આજના સમયની સૌથી મોટી જરૂરિયાત છે. આ જ વિચારને સાકાર કરવા માટે "યુ નો ધીસ" બ્લોગની શરૂઆત કરવામાં આવી છે. આ એક એવું અનોખું ડિજિટલ પ્લેટફોર્મ છે, જ્યાં તમને જ્ઞાન, વિજ્ઞાન, ટેકનોલોજી, ઇતિહાસ, અજાણી હકીકતો અને જીવનશૈલી જેવા વિવિધ વિષયો પર સચોટ, રસપ્રદ અને ઉપયોગી માહિતી સરળ ભાષામાં મળી રહે છે. આજના ડિજિટલ યુગમાં માહિતીનો અખૂટ ભંડાર ઉપલબ્ધ છે, પરંતુ મોટાભાગે સાચી અને ગળે ઊતરે તેવી માહિતી મેળવવી મુશ્કેલ બની જાય છે
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4.10.26
ten type of human
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(33199) The Ten Types of Human Book Summary in Hindi | 10 Human Personalities Explained | Life Changing Book - YouTube
https://www.youtube.com/watch?v=uGM4TsrSDPM
Transcript:
अगर तुमने इस वीडियो पर क्लिक किया है तो शायद तुम भी लोगों को देखकर उन्हें जज करते हो। किसी को देखकर बोल देते हो कि यह तो जन्म से टैलेंटेड है। यह तो सेल्फिश है। यह कभी नहीं बदल सकता या फिर सबसे खतरनाक लाइन। मैं ऐसा ही हूं। मैं बदल नहीं सकता। लेकिन अगर मैं तुमसे कहूं कि इंसान कोई एक फिक्स पर्सनालिटी नहीं है बल्कि हर इंसान के अंदर 10 अलग-अलग इंसान रहते हैं और तुम्हारी पूरी जिंदगी इस बात पर डिपेंड करती है कि किसी भी सिचुएशन में उन 10 में से कौन सा इंसान कंट्रोल लेता है। तो आज की इस वीडियो में हम बात करेंगे बुक द टाइप्स ऑफ ह्यूमन की जिसे लिखा है
डेक्स डायस ने। लेकिन ध्यान रहे यह कोई मोटिवेशनल बुक नहीं है। यह कोई सिर्फ पॉजिटिव सोचों वाली किताब भी नहीं है। बल्कि यह बुक साइकोलॉजी, न्यूरोसाइंस और रियल लाइफ स्टोरीज के जरिए यह बताती है कि इंसान असल में कैसे काम करता है और क्यों कोई भी इंसान हमेशा एक जैसा नहीं रहता। तो अगर तुम सच में समझना चाहते हो कि कभी तुम बहुत कॉन्फिडेंट क्यों होते हो और कभी बिल्कुल डर जाते हो। कभी बहुत दयालु बन जाते हो और कभी बिना वजह गुस्से में आ जाते हो और सबसे जरूरी कैसे अपने अंदर के बेहतर इंसान को कंट्रोल देना है तो इस वीडियो को आखिर तक देखना क्योंकि हो सकता
है कि इस वीडियो के बाद तुम पहली बार खुद को सही तरीके से समझ पाओ। सो विदाउट वेस्टिंग अ सिंगल सेकंड लेट्स गेट स्टार्टेड। सबसे पहले एक सवाल क्या तुमने कभी नोटिस किया है कि एक ही इंसान ऑफिस में बिल्कुल अलग होता है। घर पर अलग, अपने दोस्तों के सामने अलग और जब कोई उसे इंसल्ट कर दे तब बिल्कुल अलग। अगर इंसान की पर्सनालिटी एक ही होती तो ऐसा क्यों होता? यही इस पूरी बुक का सबसे बड़ा आईडिया है। हम लोग बचपन से यही सुनते आए हैं। उसका नेचर ऐसा है। वो गुस्सैल है। वो बहुत शर्मीला है। वो बहुत अच्छा इंसान है। लेकिन ऑथर कहता है यही सबसे बड़ी गलतफहमी
है। कोई भी इंसान हमेशा अच्छा नहीं होता। कोई भी इंसान हमेशा बुरा नहीं होता। और कोई भी इंसान हमेशा बहादुर या हमेशा डरपोक नहीं होता। असलियत यह है हर इंसान के अंदर कई अलग-अलग वर्जन मौजूद होते हैं और सिचुएशन तय करती है कि उनमें से कौन बाहर आएगा। सोचो एक डॉक्टर जो पूरे दिन लोगों की जान बचाता है वही घर जाकर अपने बच्चों पर गुस्सा कर देता है। एक पुलिस ऑफिसर जो अपराधियों से नहीं डरता वही स्टेज पर 500 लोगों के सामने बोलने से डर जाता है। एक स्टूडेंट जो एग्जाम में टॉपर है वही रिश्तों को संभालने में पूरी तरह फेल हो जाता है। अगर
पर्सनालिटी फिक्स होती तो यह सब कभी नहीं होता। यही वजह है कि इस बुक का नाम द टाइप्स ऑफ ह्यूमन रखा गया है। क्योंकि लेखक का कहना है तुम एक इंसान नहीं हो। तुम्हारे अंदर 10 अलग-अलग इंसान रहते हैं। और जिंदगी का गेम इस बात पर डिपेंड करता है कि तुम किस इंसान को सबसे ज्यादा खाना खिला रहे हो। अब तुम्हारे मन में सवाल आएगा यह 10 इंसान कौन है? क्या यह कोई मोटिवेशनल कांसेप्ट है? नहीं। यह रियल साइकोलॉजी और हजारों केस स्टडीज पर बेस्ड है। और पहला इंसान जो लगभग हर किसी के अंदर सबसे ज्यादा एक्टिव रहता है वो है द पर्सवर। यानी देखने वाला इंसान। ध्यान से समझना
क्योंकि यहीं से हमारी लगभग हर गलती शुरू होती है। मान लो तुम किसी नए इंसान से मिले। उसने तुमसे हाथ नहीं मिलाया। बस इतना हुआ और तुम्हारा दिमाग तुरंत स्टोरी बनाना शुरू कर देगा। यह एटीट्यूड दिखा रहा है। इसको खुद पर बहुत घमंड है। [गला साफ़ करने की आवाज़] इसको मैं पसंद नहीं आया। जबकि सच्चाई क्या हो सकती है? हो सकता है वह किसी टेंशन में हो। हो सकता है उसने तुम्हें देखा ही ना हो या हो सकता है वह सोशल एंग्जायटी से जूझ रहा हो। लेकिन हमारा दिमाग क्या करता है? बिना पूरी जानकारी के कहानी बना देता है। ऑथर कहता है इंसान कैमरा नहीं है। इंसान एक
स्टोरी मेकर है। हम दुनिया को जैसी है वैसी नहीं देखते। हम दुनिया को वैसे देखते हैं जैसा हमारा दिमाग उसे इंटरप्रेट करता है। और यही वजह है कि एक ही सिचुएशन को दो लोग बिल्कुल अलग तरीके से देखते हैं। मान लो बारिश हो रही है। एक किसान खुश है क्योंकि उसकी फसल बच जाएगी। एक डिलीवरी बॉय परेशान है क्योंकि उसे भीग कर काम करना पड़ेगा। एक कपल रोमांटिक फील कर रहा है और एक मजदूर सोच रहा है आज काम नहीं मिला तो घर कैसे चलेगा? बारिश वही [संगीत] है लेकिन दुनिया चार अलग-अलग बन गई। मतलब दुनिया नहीं बदलती उसे देखने वाला इंसान बदल जाता है। अब जरा
अपनी लाइफ के बारे में सोचो। कितनी बार ऐसा हुआ होगा [संगीत] कि किसी ने तुम्हें रिप्लाई नहीं दिया और तुमने मान लिया। अब यह मुझे इग्नोर कर रहा है। कितनी बार किसी ने तुम्हारी तारीफ नहीं की और तुमने सोच लिया मैं बेकार हूं। कितनी बार एक छोटी सी फेलियर के बाद तुमने खुद को ही जज कर दिया। मैं जिंदगी में कुछ नहीं कर सकता। लेकिन क्या यह फैक्ट था या सिर्फ तुम्हारे दिमाग की बनाई हुई स्टोरी? ऑथर कहता है हमारे फैसले, हमारे रिश्ते, हमारा कॉन्फिडेंस यहां तक कि हमारी पूरी पहचान अक्सर उन कहानियों पर बनी होती है जो कभी सच थी ही नहीं। और यही कारण है कि
दो लोग एक जैसी लाइफ जीते हुए भी पूरी तरह अलग इंसान बन जाते हैं। एक हर प्रॉब्लम में मौका देखता है और दूसरा हर मौके में प्रॉब्लम। अब यहां एक बहुत खतरनाक बात आती है। अगर तुम अपने दिमाग की हर स्टोरी को सच मान लोगे तो तुम कभी नहीं बदलोगे क्योंकि फिर तुम्हें लगेगा मैं ऐसा ही हूं। लोग हमेशा मेरे खिलाफ हैं। मेरी किस्मत ही खराब है। और धीरे-धीरे तुम्हारा दिमाग उसी कहानी के हिसाब से सबूत ढूंढना शुरू कर देगा। यही वजह है कि जो इंसान खुद को कमजोर मानता है उसे हर जगह अपनी कमजोरी दिखती है। जो खुद को रिजेक्टेड मानता है उसे हर
इंसान दुश्मन लगता है। और जो खुद को ग्रोथ माइंडसेट में रखता है उसे हर हार में सीख दिखती है। इसलिए ऑथर पहली सीख देता है हर विचार पर भरोसा मत करो। क्योंकि हर विचार सच नहीं होता। कई बार तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन कोई दूसरा इंसान नहीं बल्कि तुम्हारा अपना दिमाग होता है। और यही सिर्फ पहला इंसान था। अभी तो नौ और बाकी हैं। लेकिन अगला इंसान पहले से भी ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि यही तय करता है कि मुश्किल समय में तुम भागोगे या खड़े रहोगे। अब सोचो अगर अचानक इस कमरे में आग लग जाए या कोई अचानक तुम्हारे ऊपर हमला कर दे या तुम्हें
अचानक पता चले कि तुम्हारा कोई अपना हॉस्पिटल में एडमिट है उस एक सेकंड में तुम्हारा दिमाग क्या करेगा क्या वो बैठकर लॉजिक लगाएगा क्या वह फायदे नुकसान का हिसाब करेगा नहीं वो सिर्फ एक काम करेगा सर्वाइव और यही एंट्री होती है तुम्हारे अंदर रहने वाले दूसरे इंसान की। द सर्वाइवर यानी बचने वाला इंसान। ध्यान से समझना क्योंकि यही वह इंसान है जिसने हजारों साल पहले हमारे पूर्वजों को जिंदा रखा था। और आज भी यही इंसान तुम्हारे अंदर मौजूद है। ऑथर कहता है जब भी तुम्हारा दिमाग किसी खतरे को महसूस करता है चाहे वह असली खतरा हो या सिर्फ
तुम्हारे दिमाग का बनाया हुआ खतरा। तुम्हारी पूरी बॉडी कुछ ही सेकंड में बदल जाती है। दिल तेजी से धलकने लगता है। सांसे तेज हो जाती हैं। हाथ कांपने लगते हैं। पसीना आने लगता है। मसल्स टाइट हो जाते हैं। और तुम्हारा दिमाग सिर्फ तीन ऑप्शन सोचता है। फाइट, फ्लाइट या फ्रीज। यानी या तो लड़ो या भागो या बिल्कुल जड़ हो जाओ। अब यहां सबसे इंटरेस्टिंग बात सुनो। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि अगर मैं फ्रीज हो गया तो मैं कायर हूं। लेकिन नहीं। ऑथर कहता है फ्रीज भी एक सर्वाइवल स्ट्रेटजी है। सोचो जंगल में एक हिरन अगर उसे लगे कि शिकारी ने उसे अभी तक नोटिस
नहीं किया तो वह भागता नहीं। वह बिल्कुल शांत खड़ा हो जाता है। क्यों? क्योंकि कई बार हिलना भागने से ज्यादा खतरनाक होता है। यानी तुम्हारा दिमाग बेवकूफ नहीं है। वह बस तुम्हें बचाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन यहीं एक बहुत बड़ी प्रॉब्लम शुरू होती है। आज के टाइम में हमारे सामने शेर नहीं आते ना ही जंगल में रहना पड़ता है। लेकिन हमारा दिमाग आज भी उसी पुराने सॉफ्टवेयर पर चल रहा है। बॉस ने डांट दिया। दिमाग बोला डेंजर स्टेज पर बोलना है डेंजर क्रश से बात करनी है डेंजर इंटरव्यू देना है डेंजर [संगीत] YouTube पर पहली वीडियो डालनी है डेंजर और
जैसे ही दिमाग ने खतरा समझा तुम्हारी बॉडी वैसे ही रिएक्ट करने लगती है जैसे कोई शेर सामने खड़ा हो यही वजह है कि कई लोग बहुत टैलेंटेड होने के बावजूद स्टेज पर जाकर सब भूल जाते हैं। कई लोग इंटरव्यू में अपनी असली पर्सनालिटी दिखा ही नहीं पाते। कई लोग बिजनेस शुरू करना चाहते हैं, लेकिन पहला कदम ही नहीं उठा पाते। क्यों? क्योंकि उनका दुश्मन बाहर नहीं अंदर बैठा सर्वाइवल सिस्टम है। अब सवाल आता है, क्या इसका मतलब है कि हमें डर खत्म करना होगा? नहीं। ऑथर कहता है, ब्रेव लोग वह नहीं होते जिन्हें डर नहीं लगता। ब्रेव लोग वह होते हैं जो डर के बावजूद सही काम करते
हैं। फियर और करज में फियर एक इमोशन है। लेकिन करज [संगीत] एक डिसीजन है। इस बात को एक स्टोरी से समझो। एक फायर फाइटर से इंटरव्यू लिया गया। उससे पूछा गया जब तुम जलती हुई बिल्डिंग में घुसते हो। क्या तुम्हें डर नहीं लगता? उसने जवाब दिया हर बार लगता है। अगर मुझे डर नहीं लगेगा तो शायद मैं जिंदा नहीं रहूंगा। फर्क सिर्फ इतना है मैंने डर के साथ काम करना सीख लिया है। यही बात लेखक पूरी किताब में बार-बार समझाता है। तुम्हारा गोल डर को खत्म करना नहीं होना चाहिए। तुम्हारा गोल अपने दिमाग को सिखाना होना चाहिए कि हर नई चीज खतरा नहीं होती। और
इसके लिए वो एक बहुत सिंपल प्रिंसिपल बताता है। स्मॉल एक्सपोज़र चेंजेस द ब्रेन। मतलब अगर तुम्हें पब्लिक स्पीकिंग से डर लगता है तो सीधे हजार लोगों के सामने मत जाओ। पहले दो लोगों के सामने बोलो, फिर पांच के सामने, फिर 10 के [संगीत] सामने। धीरे-धीरे तुम्हारा दिमाग सीख जाएगा कि मैं बच गया। कुछ बुरा नहीं हुआ। और हर बार तुम्हारा फियर रिस्पांस थोड़ा-थोड़ा कमजोर होता जाएगा। यही वजह है कि जो इंसान रोज मुश्किल काम करता है, वह धीरे-धीरे मेंटली मजबूत बन जाता है। इसलिए नहीं क्योंकि उसका डर खत्म हो गया। बल्कि इसलिए क्योंकि उसका दिमाग
अब हर चीज को खतरा मानना छोड़ देता है। अब यहां एक और खतरनाक गलती जो आज लगभग हर युवा कर रहा है। वह हर उस चीज से भागता है जो उसे अनकंफर्टेबल बनाती है। कैमरा ऑन करना है। कल करेंगे। लोग क्या कहेंगे? जिम जाना है? अगले सोमवार से बिजनेस शुरू करना है। पहले थोड़ा और सीख लेते हैं। क्रश से बात करनी है। अभी सही टाइम नहीं है। और हर बार जब तुम डर की वजह से पीछे हटते हो, तुम अपने दिमाग को एक नया मैसेज भेजते हो। हां, यह चीज सच में खतरनाक थी। और अगली बार वह डर पहले से और बड़ा हो जाता है। ऑथर कहता है तुम्हारी जिंदगी उन चीजों से छोटी होती
जाती है जिनसे तुम बचते रहते हो और बड़ी होती जाती है जिनका तुम सामना करते हो। इसलिए अगर तुम सच में बदलना चाहते हो तो हर दिन एक ऐसा काम करो जिससे तुम्हें थोड़ा डर लगता हो क्योंकि वहीं तुम्हारा अगला वर्जन छुपा बैठा है। लेकिन अभी तक हमने सिर्फ यह समझा कि हमारा दिमाग हमें बचाने की कोशिश करता है। अब तीसरा इंसान उससे भी ज्यादा अजीब है। क्योंकि कई बार तुम किसी गलत काम को जानते हुए भी सिर्फ इसलिए कर देते हो क्योंकि बाकी सब वही कर रहे होते हैं। अब मैं तुमसे एक सवाल पूछता हूं। मान लो तुम एक कमरे में अकेले बैठे हो। अचानक कोई
अंदर आता है और बिना किसी वजह के छत की तरफ देखने लगता है। कुछ सेकंड बाद दूसरा इंसान आता है। वो भी ऊपर देखने लगता है। फिर तीसरा फिर चौथा और कुछ ही देर में पूरा कमरा छत की तरफ देख रहा होता है। अब सोचो अगर तुम उस कमरे में होते तो क्या करते? सच सच बताना। बहुत ज्यादा चांस है कि तुम भी ऊपर देखने लगते। लेकिन क्यों? क्या तुम्हें पता था कि ऊपर क्या है? नहीं। क्या किसी ने तुम्हें बोला था? नहीं। फिर भी तुम देखते। और यही है तुम्हारे अंदर रहने वाला तीसरा इंसान। द फॉलोअर। यानी दूसरों को फॉलो करने वाला इंसान। सुनने में यह बहुत छोटी बात लगती है।
लेकिन ऑथर कहता है इंसानी इतिहास की सबसे बड़ी सफलताओं के पीछे भी यही इंसान था और सबसे बड़ी तबाहियों के पीछे भी यही इंसान था। ध्यान से समझना क्योंकि अगर तुमने इसे नहीं समझा तो पूरी जिंदगी तुम्हें लगेगा कि तुम अपने फैसले खुद ले रहे हो। जबकि हकीकत में तुम सिर्फ भीड़ को कॉपी कर रहे हो। बचपन से लेकर आज तक तुम्हें कितनी चीजें सिर्फ इसलिए पसंद है क्योंकि बाकी लोगों को पसंद है। कपड़े, हेयर स्टाइल, फोन, म्यूजिक, फिल्में यहां तक कि कई बार तुम्हारे सपने भी। सोचो अगर दुनिया में किसी ने कभी BMW, iPhone या RX का नाम ही नहीं सुना होता तो क्या
आज भी लोग उनके पीछे भागते? शायद [संगीत] नहीं। क्यों? क्योंकि इंसान चीजों को सिर्फ उनकी वैल्यू से नहीं बल्कि लोगों के रिएक्शन से भी जज करता है। इसे साइकोलॉजी में कहते हैं [गला साफ़ करने की आवाज़] सोशल प्रूफ। मतलब अगर बाकी लोग कर रहे हैं तो हमारा दिमाग मान लेता है कि शायद यही सही होगा और यहीं से शुरू होती है भीड़ वाली सोच। अब तुम बोलोगे भाई मैं किसी को फॉलो नहीं करता। पक्का? चलो एक छोटा सा टेस्ट करते हैं। मान लो तुम Instagram खोलते हो। एक वीडियो पर 50 लाख लाइक्स हैं। दूसरी वीडियो पर सिर्फ 20 लाइक्स। तुम सबसे पहले किस वीडियो को देखोगे?
ज्यादातर लोग 50 लाख वाली। क्यों? क्योंकि हमारा दिमाग सोचता है इतने लोग गलत नहीं हो सकते। लेकिन ऑथर कहता है यही सोच कई बार सबसे बड़ा जाल बन जाती है। इतिहास में कई ऐसे एक्सपेरिमेंट हुए जिनमें लोगों ने सिर्फ इसलिए गलत जवाब दिया क्योंकि कमरे में मौजूद बाकी लोग भी वही गलत जवाब दे रहे थे। उन्हें पता था कि जवाब गलत है। फिर भी उन्होंने भीड़ का साथ दिया। क्यों? क्योंकि इंसान को गलत होने से ज्यादा अकेला होने से डर लगता है। और अब जरा अपनी लाइफ देखो। कितनी बार तुमने सिर्फ इसलिए कोई गोल छोड़ दिया [संगीत] क्योंकि लोगों ने कहा इसमें कुछ नहीं रखा। कितनी बार तुम
कैमरे के सामने नहीं आए क्योंकि दोस्तों ने मजाक उड़ा दिया। कितनी बार तुमने अपना असली ओपिनियन छुपा लिया क्योंकि बाकी सब कुछ और बोल रहे थे। यही है द फॉलोअ। यह इंसान तुम्हें सुरक्षित महसूस कराता है। लेकिन कई बार तुम्हारी पूरी जिंदगी एवरेज भी बना देता है। ऑथर यहां एक बहुत इंटरेस्टिंग बात कहते हैं। भीड़ हमेशा गलत नहीं होती। अगर तुम नई जगह जाओ और सब लोग एक तरफ भाग रहे हो तो शायद तुम्हें भी भागना चाहिए क्योंकि हो सकता है वहां सच में खतरा हो। यानी भीड़ को फॉलो करना कई बार समझदारी है लेकिन हर बार नहीं। यही मैच्योर इंसान और ब्लाइंड फॉलोअ में फर्क
आता है। मैच्योर इंसान भीड़ को देखता है लेकिन फैसला अपना लेता है। ब्लाइंड फॉलोअ भीड़ को देखकर सोचना ही बंद कर देता है। और आज सोशल मीडिया ने इस इंसान को पहले से भी ज्यादा ताकतवर बना दे दिया है। [संगीत] कोई एक मॉर्निंग रूटीन वायरल हो गया। सब वही कर रहे हैं। कोई एक बिजनेस मॉडल वायरल हो गया। सब उसी में कूद पड़े। कोई एक कोर्ट ट्रेंड कर गया। सब उसे अपनी लाइफ फिलॉसफी बना लेते हैं। लेकिन सवाल यह है क्या वह चीज तुम्हारे लिए सही भी है या सिर्फ वायरल है? ऑथर कहता है पॉपुलैरिटी इज नॉट प्रूफ। किसी चीज का फेमस होना यह साबित नहीं करता कि वह सही भी है। और यही
वह जगह है जहां ज्यादातर लोग हार जाते हैं। वह सोचते हैं अगर सब यही कर रहे हैं तो मैं भी यही करूंगा। लेकिन जो लोग दुनिया बदलते हैं, वह पहले ऑब्जरर्वेशन करते हैं, फिर क्वेश्चन करते हैं और उसके बाद डिसीजन लेते हैं। अब ध्यान से सुनना क्योंकि यह लाइन पूरी किताब का सबसे पावरफुल लेसंस में से एक है। अगर तुम हर फैसले से पहले यह सोचते हो कि लोग क्या कहेंगे, तो समझ लो तुम्हारी जिंदगी का रिमोट तुम्हारे हाथ में नहीं है। और जिस दिन तुमने भीड़ की अप्रूवल से ऊपर उठकर अपने वैल्यू्यूज के हिसाब से फैसले लेना शुरू कर दिया, उसी दिन तुम्हारे अंदर का
लीडर फॉलोअ पर जीतना शुरू कर देगा। लेकिन यही कहानी खत्म नहीं होती क्योंकि हमारे अंदर एक और इंसान रहता है जो सिर्फ भीड़ को फॉलो नहीं करता बल्कि जरूरत पड़ने पर पूरी भीड़ के खिलाफ अकेला खड़ा भी हो जाता है और यही चौथा इंसान तय [संगीत] करता है कि तुम जिंदगी भर दूसरों के पीछे चलोगे या कभी अपना रास्ता खुद बनाओगे। अब सोचो अगर पूरी क्लास किसी एक बच्चे का मजाक उड़ा रही हो और तुम्हें अंदर से पता हो कि वह बच्चा गलत नहीं है तो तुम क्या करोगे? क्या तुम उसके लिए खड़े हो जाओगे? या फिर चुपचाप बाकी लोगों की तरह हंस दोगे। सच बताऊं?
यहीं पर इंसान की असली परीक्षा शुरू होती है क्योंकि अकेले सही होना बहुत मुश्किल है और भीड़ के साथ गलत होना बहुत आसान। [गला साफ़ करने की आवाज़] यही वजह है कि ऑथर हमारे अंदर रहने वाले चौथे इंसान की बात करता है। द रेिस्टर यानी विरोध करने वाला इंसान। [गला साफ़ करने की आवाज़] ध्यान से समझना क्योंकि यही वह इंसान है जो इतिहास बदलता है। बाकी लोग जहां भीड़ को फॉलो करते हैं [गला साफ़ करने की आवाज़] वहीं यह [संगीत] इंसान भीड़ से सवाल पूछता है। बाकी लोग जहां कहते हैं सब यही कर रहे हैं वहीं यह पूछता है। लेकिन क्या यह सही भी है? और
यही फर्क एक आम इंसान और एक लीडर में होता है। लेकिन यहां एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। लोग सोचते हैं कि जो हर बात पर बहस करे वही स्ट्रांग होता है। नहीं [संगीत] हर बात पर लड़ना स्ट्रेंथ नहीं इनसिक्योरिटी भी हो सकती है। द रेजिस्टर का मतलब हर किसी का विरोध करना नहीं है बल्कि [संगीत] जब पूरी दुनिया गलत दिशा में जा रही हो तब सही दिशा में चलने की हिम्मत रखना है। अब मैं तुमसे एक सवाल पूछता हूं। तुम्हारी जिंदगी में कितने फैसले सच में तुम्हारे अपने थे? सोच कर जवाब देना। तुमने कौन सा सब्जेक्ट लिया? क्यों? तुम कौन सा करियर चुनना चाहते हो? क्यों? तुम किस तरह के
कपड़े पहनते हो? क्यों? क्या यह सब तुम्हारा फैसला था? या धीरे-धीरे समाज ने, परिवार ने, दोस्तों ने और सोशल मीडिया ने तुम्हारे लिए यह फैसले कर दिए? ऑथर कहता है ज्यादातर लोग अपनी पूरी जिंदगी बोरोड लाइफ जीते हैं। मतलब सपने भी उधार के, गोल्स भी उधार के, डेफिनेशन ऑफ सक्सेस भी उधार की। और सबसे दुख की बात उन्हें कभी पता भी नहीं चलता। अब यहां लेखक एक बहुत इंटरेस्टिंग बात कहता है। हम सब सोचते हैं कि हम इंडिपेंडेंट थिंकर्स हैं। लेकिन अगर सच में ऐसा होता तो दुनिया में इतने सारे लोग एक जैसी जिंदगी क्यों जी रहे हैं? सुबह उठो, डिग्री लो, जॉब करो,
[संगीत] ईएमआई भरो, वीकेंड का इंतजार करो और फिर वही रिपीट। मैं यह नहीं कह रहा कि इसमें कुछ गलत है। गलत तब है जब तुमने यह रास्ता सोचे बिना चुना हो। अगर तुमने सोच समझ कर चुना है तो बहुत बढ़िया। लेकिन अगर सिर्फ इसलिए चुना क्योंकि सब यही कर रहे हैं। तो शायद तुम अभी तक अपनी जिंदगी जी ही नहीं रहे। [नाक से की जाने वाली आवाज़] द रजिस्टर यहीं जागता है। वह हर चीज पर सवाल करता है। लेकिन सवाल करने और शिकायत करने में बहुत बड़ा फर्क होता है। आजकल लोग सोचते हैं हर बात की क्रिटिसिज्म करना मतलब स्मार्ट होना। नहीं। ऑथर कहता है सिर्फ प्रॉब्लम देखना आसान है। सॉल्यूशन
बनना मुश्किल है। इसलिए असली रेजिस्टर सिर्फ यह गलत है नहीं बोलता। वो यह भी सोचता है तो सही क्या हो सकता [संगीत] है? अब जरा अपनी डेली लाइफ देखो। तुम्हें सुबह जल्दी उठना है लेकिन दोस्त कहते हैं सो जा यार। तुम्हें पढ़ना [संगीत] है लेकिन Instagram खोल लेते हो क्योंकि सब वही कर रहे हैं। तुम्हें जिम जाना है लेकिन ग्रुप घूमने चल पड़ा और तुम भी चले गए। धीरे-धीरे तुम्हें लगने लगता है कि तुम डिसीजन ले रहे हो। जबकि रियलिटी यह है तुम सिर्फ परिस्थितियों के साथ बह रहे हो। ऑथर एक लाइन कहता है जो मुझे बहुत पावरफुल लगी। अगर तुम हर बार आसान रास्ता चुनते
रहोगे तो एक दिन तुम्हें महसूस होगा कि तुम्हारी पूरी जिंदगी किसी और ने डिजाइन कर दी। और शायद यही आज की सबसे बड़ी प्रॉब्लम है। लोग फ्रीडम चाहते हैं लेकिन डिसिप्लिन नहीं, रिस्पेक्ट चाहते हैं लेकिन रिस्पांसिबिलिटी नहीं। सक्सेस चाहते हैं लेकिन रेजिस्टेंस नहीं। जबकि रियलिटी बिल्कुल उल्टी है। हर बड़ी अचीवमेंट पहले रेजिस्टेंस मांगती है। जिम जाना रेजिस्टेंस। बिजनेस शुरू करना रेजिस्टेंस। पब्लिक स्पीकिंग रेजिस्टेंस। मॉर्निंग रूटीन रेजिस्टेंस। कैमरा ऑन करना रेजिस्टेंस। यानी जो इंसान अपने अंदर के रेजिस्टेंस को जीत लेता है। उसे बाहर की दुनिया
धीरे-धीरे आसान लगने लगती है। लेकिन अब यहां कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट आता है। क्योंकि सिर्फ दूसरों का विरोध करना ही काफी नहीं। कई बार तुम्हारा सबसे बड़ा विरोधी कोई और नहीं बल्कि तुम खुद होते हो। तुम्हारे अपने एक्सक्यूसेस, तुम्हारी अपनी आदतें, तुम्हारा अपना कंफर्ट ज़ोन। और अगला ह्यूमन टाइप इसी के बारे में है। क्योंकि अब हम बात करेंगे उस इंसान की जो हर रात तुम्हें बड़े-बड़े सपने दिखाता है और हर सुबह अलार्म बजते ही उन्हें मार देता है। अब मैं चाहता हूं कि तुम 1 मिनट के लिए बिल्कुल ईमानदारी से अपने बारे में सोचो। कितनी बार ऐसा हुआ है
कि रात को सोने से पहले तुमने अपने आप से वादा किया बस [नाक से की जाने वाली आवाज़] अब जिंदगी बदलनी है। कल से सुबह 5:00 बजे उठूंगा। कल से फोन कम चलाऊंगा। [संगीत] कल से पढ़ाई शुरू। कल से जिम, कल से मेडिटेशन, कल से नई लाइफ। और फिर सुबह अलार्म बजा। तुमने स्नूज़ किया। फिर एक बार। फिर एक बार। और जब आंख खुली तो सबसे पहला काम क्या किया? फोन उठाया। Instagram, YouTube शॉट्स, WhatsApp और बस रात वाला हीरो सुबह विलेन बन गया। लेकिन सवाल यह है ऐसा होता क्यों है? क्या तुम वीक हो? क्या तुम्हारे अंदर विल पावर नहीं है? या फिर तुम आलसी पैदा हुए हो? ऑथर
कहता है नहीं। असल में तुम्हारे अंदर एक और इंसान रहता है। द कंट्रोलर और उसके सामने खड़ा होता है द इंपल्सिव ह्यूमन। यानी एक इंसान जो लॉन्ग टर्म फ्यूचर देखता है और दूसरा जो सिर्फ अभी का मजा चाहता है। ध्यान से समझना क्योंकि [गला साफ़ करने की आवाज़] अगर तुमने इस हिस्से को समझ लिया तो तुम्हें पहली बार समझ आएगा कि तुम अपने ही डिसीजंस के खिलाफ क्यों चले जाते हो। सोचो अगर तुम्हारे सामने अभी दो ऑप्शन रख दिए जाए। पहला अभी ₹500 ले लो। दूसरा एक महीने बाद ₹5000। लॉजिक क्या कहता है? ₹000। लेकिन दुनिया के लाखों लोग आज भी 500 चुन
लेते हैं। क्यों? क्योंकि हमारा दिमाग फ्यूचर रिवॉर्ड से ज्यादा इमीडिएट रिवॉर्ड्स को पसंद करता है। इसीलिए पढ़ाई मुश्किल लगती है [संगीत] लेकिन रील्स आसान। जिम मुश्किल लगता है लेकिन बेड आसान। बुक बोरिंग [संगीत] लगती है लेकिन Netflix मजेदार। यह तुम्हारी गलती नहीं। यह तुम्हारे दिमाग की वायरिंग है। ऑथर कहता है, हमारे अंदर बैठा इंपल्सिव ह्यूमन हमेशा इंस्टेंट प्लेजर चाहता है और यही वजह है कि वह हर बार कंट्रोलर को हराने की कोशिश करता है। अब यहां एक बहुत खतरनाक बात आती है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि डिसिप्लिन मोटिवेशन से आता है। गलत। अगर ऐसा होता तो
न्यू ईयर रेजोल्यूशन बनाने वाले 90% लोग एक महीने के अंदर हार नहीं मानते। मोटिवेशन इमोशन है और इमोशन मौसम की तरह बदलता रहता है। आज हाई कल लो। लेकिन कंट्रोलर इमोशन पर नहीं सिस्टम पर चलता है। यही फर्क है सक्सेसफुल लोगों में और एवरेज लोगों में। सक्सेसफुल लोग हर दिन मोटिवेटेड नहीं होते। लेकिन उन्होंने अपने सिस्टम ऐसे बनाए होते हैं कि उन्हें हर बार डिसीजन लेना ही नहीं पड़ता। सोचो अगर तुम्हारा फोन रात को ही दूसरे कमरे में रख दिया जाए तो सुबह उठकर रील्स देखने का चांस कम हो जाएगा। अगर जिम बैग रात को ही दरवाजे के पास रख दिया जाए
तो जिम जाने की प्रोबेबिलिटी बढ़ जाएगी। अगर पढ़ाई की टेबल पर सिर्फ बुक हो और फोन ना हो तो फोकस अपने आप इंप्रूव होगा। यानी स्ट्रांग विल पावर से ज्यादा स्ट्रांग एनवायरमेंट जरूरी है। ऑथर बार-बार यही समझाता है। तुम्हें हर बार खुद से लड़ना नहीं है। तुम्हें ऐसी लाइफ डिजाइन करनी है जहां लड़ाई कम करनी पड़े। अब जरा अपने पूरे दिन को ऑब्जर्व करो। सुबह अलार्म डिसीजन। क्या उठूं या 10 मिनट और? ब्रेकफास्ट। डिसीजन हेल्दी खाऊं या जंक? स्टडी। डिसीजन बुक खोलूं या YouTube हर घंटे हर मिनट तुम्हारा कंट्रोलर और इंपल्सिव ह्यूमन एक दूसरे से लड़ रहे होते
हैं। और सबसे बड़ी प्रॉब्लम क्या है? कंट्रोलर थक जाता है। इसे साइकोलॉजी में कहते हैं डिसीजन फटीग। मतलब जितने ज्यादा फैसले लोगे, उतनी कम सेल्फ कंट्रोल बचती जाएगी। यही वजह है कि रात होते-होते लोग सबसे ज्यादा गलत डिसीजंस लेते हैं। लेट नाइट ईटिंग, एंडलेस स्क्रूलिंग, प्रोक्रास्टिनेशन सब वहीं होता है। क्यों? क्योंकि कंट्रोलर पूरे दिन लड़ते-लड़ते थक चुका होता है। अब सवाल आता है क्या इसका सशन है? ऑथर कहता है हां। लेकिन स्यूशन विल पावर नहीं रिचुअल्स हैं। मतलब कुछ काम ऐसे बना दो जो ऑटोमेटिक हो जाए। [संगीत] जैसे हर सुबह उठकर बिना सोचे पानी पीना,
बिना सोचे वॉकिंग शूज पहनना, बिना सोचे 20 मिनट पढ़ना। जब कोई हैबिट ऑटोमेटिक बन जाती है तो कंट्रोलर को हर बार लड़ना नहीं पड़ता। और यहीं से रियल फ्रीडम शुरू होती है। अब मैं तुम्हें एक लाइन बोलता हूं जो शायद इस पूरी किताब की सबसे प्रैक्टिकल लाइंस में से एक है। तुम वही इंसान नहीं बनते जो बड़े-बड़े डिसीजंस लेता है। तुम वही इंसान बनते हो जो छोटे-छोटे डिसीजंस रोज रिपीट करता है। यानी तुम्हारी आइडेंटिटी एक दिन में नहीं बनती। वो हर रोज हर छोटी हैबिट से बनती है। लेकिन यही एक और प्रॉब्लम है। क्योंकि कई बार तुम्हारा कंट्रोलर मजबूत होता है। हैबिट्स
भी अच्छी होती हैं। फिर भी तुम गलत डिसीजन ले लेते हो। क्यों? क्योंकि अब एंट्री होती है तुम्हारे अंदर रहने वाले सबसे चालाक इंसान की जो हर गलती के बाद तुम्हें इतना अच्छा एक्सक्यूज देता है कि तुम्हें अपनी गलती गलती ही नहीं लगती। और यही अगला ह्यूमन टाइप है जो अक्सर तुम्हारी पूरी जिंदगी को बिना शोर किए धीरे-धीरे बर्बाद करता रहता है। अब मैं चाहता हूं कि तुम अपने दिमाग में पिछले सात दिनों को याद करो। कोई एक ऐसी गलती जो तुम जानते थे कि नहीं करनी चाहिए। फिर भी कर दी। शायद तुमने पढ़ाई छोड़कर फोन चला लिया। शायद तुमने गुस्से में किसी अपने को कुछ ऐसा
बोल दिया जो नहीं बोलना चाहिए था। शायद तुमने कोई काम टाल दिया। लेकिन उसके बाद क्या हुआ? क्या तुमने अपने आप से यह कहा? हां गलती मेरी थी। या फिर तुमने तुरंत कोई बहाना ढूंढ लिया। यार आज मूड नहीं था। नींद पूरी नहीं हुई थी। घर का माहौल ठीक नहीं था। कल से पक्का। अगर ध्यान से देखो तो इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसका दिमाग [संगीत] है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी चालाकी भी यही दिमाग है। और इसी वजह से ऑथर अगले ह्यूमन टाइप की बात करता है। द स्टोरी टेलर यानी कहानी बनाने वाला इंसान। ध्यान से समझना क्योंकि यही इंसान तुम्हारी पूरी आइडेंटिटी बनाता भी है और
कई बार उसे बर्बाद भी कर देता है। ऑथर कहता है इंसान फैक्ट्स पर नहीं स्टोरीज पर जीता है। हर इंसान अपने बारे में, दुनिया के बारे में और अपनी जिंदगी के बारे में एक कहानी बना चुका होता है। जैसे मैं पढ़ाई में अच्छा नहीं हूं। [गला साफ़ करने की आवाज़] मैं इंट्रोवर्ट हूं। मैं बिजनेस के लिए नहीं बना। हमारे घर में कोई सक्सेसफुल नहीं हुआ। मेरी लक खराब है। अब ध्यान देना इनमें से कितनी बातें साबित की जा सकती हैं। शायद एक भी नहीं लेकिन तुम्हारा दिमाग उन्हें फैक्ट की तरह ट्रीट करता है और फिर उसी हिसाब से एविडेंस इकट्ठा करना शुरू कर देता है। एक
बार अगर तुमने मान लिया मैं पब्लिक स्पीकिंग में खराब हूं तो अगली बार जब भी तुम स्टेज पर जाओगे तुम्हारा दिमाग सिर्फ तुम्हारी गलतियां नोटिस करेगा। अगर तुमने मान लिया लोग मुझे पसंद नहीं करते। तो कोई 100 लोग तुम्हारे साथ अच्छा बिहेवियर करेंगे। फिर भी एक इंसान इग्नोर करेगा और तुम्हारा दिमाग उसी पर फोकस करेगा। यानी हम रियलिटी नहीं देखते। हम अपनी स्टोरी के हिसाब से रियलिटी चुनते हैं। और यही सबसे डेंजरस ट्रैप है। अब सोचो दो स्टूडेंट्स एग्जाम में फेल हुए। पहला बोला मैं बेवकूफ हूं। दूसरा बोला मेरी प्रिपरेशन गलत थी। रिजल्ट दोनों का सेम था लेकिन उनकी कहानी
अलग थी और यही कहानी उनका फ्यूचर तय करेगी। पहला स्टूडेंट शायद अगली बार भी हाफ हार्टेड कोशिश करेगा क्योंकि उसकी आइडेंटिटी बन चुकी है। मैं नहीं कर सकता। दूसरा स्टूडेंट स्ट्रेटजी बदलेगा क्योंकि उसकी स्टोरी अलग है। मैं इंप्रूव कर सकता हूं। ऑथर कहता है इंसान अक्सर रियलिटी से नहीं हारता। वह अपनी बनाई हुई कहानी से हार जाता है। अब यहां एक बहुत इंटरेस्टिंग एक्सपेरिमेंट आता है। साइकोलॉजिस्ट ने कुछ लोगों से कहा तुम बहुत इंटेलिजेंट हो और कुछ लोगों से कहा तुम एवरेज हो। असल में दोनों ग्रुप्स बराबर थे। लेकिन कुछ समय बाद जिन लोगों को इंटेलिजेंट कहा गया था,
उन्होंने बेहतर परफॉर्मेंस दी। क्यों? क्या उनका आईक्यू अचानक बढ़ गया? नहीं। उनकी स्टोरी बदल गई और स्टोरी बदलते ही बिहेवियर बदल गया। यानी तुम अपने बारे में जो बार-बार बोलते हो धीरे-धीरे तुम वैसे लगते हो। इसलिए अगर तुम हर दिन यह बोलते रहोगे मेरे बस की बात नहीं। तो शायद एक दिन सच में तुम्हारे बस की बात नहीं रहेगी। लेकिन अगर तुम यह कहो अभी नहीं आता लेकिन सीख सकता हूं तो दिमाग पूरी तरह अलग तरीके से काम करेगा। अब यहां एक चीज क्लियर कर दूं। इसका मतलब यह नहीं कि फेक कॉन्फिडेंस लेकर घूमो। ऑथर ब्लाइंड पॉजिटिविटी की बात नहीं करता। वो कहता है
गलत स्टोरी मत बनाओ। सही स्टोरी बनाओ। अगर तुम फेल हुए हो तो यह मत बोलो मैं फेलियर हूं। यह बोलो मैं फेल हुआ हूं। दोनों में सिर्फ दो शब्दों का फर्क है लेकिन पूरी जिंदगी बदल सकती है क्योंकि पहले सेंटेंस में तुमने फेलियर को अपनी आइडेंटिटी बना लिया। दूसरे में तुमने उसे सिर्फ एक इवेंट माना और याद रखना इवेंट्स बदलते हैं। आइडेंटिटी भी बदल सकती है। अब सोचो अगर तुम्हारी पूरी जिंदगी उन कहानियों पर चल रही है जो तुमने खुद बनाई हैं तो सबसे जरूरी सवाल क्या होना चाहिए? क्या मेरी कहानी सच भी है या मैंने बस उसे बार-बार दोहराकर सच मान लिया है। ऑथर कहता है जिस
दिन तुम अपनी स्टोरी को क्वेश्चन करना सीख जाओगे उसी दिन तुम अपनी जिंदगी को रीाइट करना भी शुरू कर दोगे। लेकिन अभी एक ह्यूमन टाइप बाकी है जो स्टोरी भी बदल सकता है, आइडेंटिटी भी बदल सकता है और जरूरत पड़े तो पूरी जिंदगी की दिशा भी बदल सकता है। क्योंकि आखिर में ऑथर एक ऐसी बात कहता है जो शायद पूरी किताब का सबसे पावरफुल मैसेज है। तुम्हारे अंदर कोई एक इंसान नहीं रहता। तुम्हारे अंदर हर दिन हर पल कई इंसान लड़ रहे होते हैं और जिंदगी उसकी नहीं बदलती जिसके अंदर सबसे ज्यादा टैलेंट होता है। जिंदगी उसकी बदलती है जो सही समय पर सही इंसान को
कंट्रोल दे देता है। अब तक अगर तुमने इस वीडियो को ध्यान से देखा है तो शायद तुम्हें एक बात समझ आ चुकी होगी। तुम्हारी सबसे बड़ी प्रॉब्लम तुम्हारा बॉस नहीं है। तुम्हारे पेरेंट्स नहीं है। तुम्हारी लक नहीं है और ना ही तुम्हारा पास्ट। तुम्हारी सबसे बड़ी प्रॉब्लम यह है कि तुम्हें खुद नहीं पता कि किसी सिचुएशन में तुम्हारे अंदर कौन सा इंसान डिसीजन ले रहा है और यही इस पूरी किताब का सबसे बड़ा लेसन है। ऑथर कहता है लोग पूरी जिंदगी अपने आप को ढूंढने में निकाल देते हैं। मैं आखिर हूं कौन? लेकिन शायद यह सवाल ही गलत है। सही सवाल यह होना चाहिए इस समय
मेरे अंदर कौन बोल रहा है? क्योंकि जब तुम गुस्से में होते हो तब एक अलग इंसान कंट्रोल में होता है। जब तुम किसी की हेल्प करते हो तब कोई और। जब तुम किसी से जलते हो तब कोई और। जब तुम किसी के लिए अपनी जान तक देने को तैयार हो जाते हो तब कोई और। यानी तुम एक कैरेक्टर नहीं हो। तुम कैरेक्टर्स की पूरी टीम हो और जिंदगी का कैप्टन हर सिचुएशन में बदलता रहता है। अब सोचो अगर किसी क्रिकेट टीम में हर ओवर के बाद कैप्टन बदलने लगे तो टीम का क्या होगा? केओस। यही तुम्हारे माइंड के साथ भी होता है। सुबह मोटिवेटेड वर्जन कैप्टन बन जाता है। आज से सब बदल दूंगा। दोपहर लेजी
वर्जन आता है। थोड़ा रेस्ट कर लेते हैं। शाम एक्सक्यूज वर्जन आता है। आज मूड नहीं है। रात गिल्ट वर्जन आता है। यार मैं अपनी लाइफ खराब कर रहा हूं। और अगले दिन फिर वही साइकिल। ऑथर कहता है जो लोग मेंटली स्ट्रांग होते हैं उनके अंदर भी यही सारे ह्यूमन टाइप्स होते हैं। फर्क सिर्फ इतना है उन्होंने अपने कैप्टन को चुनना सीख लिया है। यानी डिसीजन इमोशंस नहीं लेते वैल्यूस लेती हैं। अब यहां एक बहुत डीप कांसेप्ट आता है। लेखक कहता है हम सबके अंदर एक ऑब्जर्वर भी रहता है। एक ऐसा हिस्सा जो इन सभी ह्यूमन टाइप्स को देख सकता है। जब तुम्हें गुस्सा आता है और
तुम्हारे दिमाग में एक आवाज आती है। रुक अभी कुछ मत बोल। वो कौन है? जब तुम फोन स्क्रोल कर रहे होते हो और अंदर से आवाज आती है बस कर बहुत हो गया वह कौन है जब तुम गलत काम करने वाले होते हो और अंदर से कुछ कहता है यह सही नहीं है वो कौन है यही तुम्हारा ऑब्जर्वर है और ऑथर कहता है जिस दिन तुमने इस ऑब्जर्वर को स्ट्रांग बना लिया उस दिन तुम अपने इमोशंस के गुलाम नहीं रहोगे अब सवाल है इस ऑब्जर्वर को स्ट्रांग कैसे करें ऑथर कोई मैजिकल टेक्निक नहीं देता वो सिर्फ अवेयरनेस की बात करता है मतलब अगली बार जब तुम्हें बहुत गुस्सा आए तुरंत रिएक्ट मत करना। बस
अपने आप से एक सवाल पूछना। अभी मेरे अंदर कौन सा ह्यूमन टाइप कंट्रोल में है? अगर बहुत डर लग रहा है तो पूछो। क्या यह सर्वाइवर बोल रहा है? अगर किसी से जलन हो रही है तो पूछो। यह फीलिंग कहां से आ रही है? अगर किसी ट्रेंड को देखकर तुम्हारा मन बदल रहा है तो पूछो। [संगीत] क्या मैं सोच रहा हूं या सिर्फ क्राउड को फॉलो कर रहा हूं? यही सवाल धीरे-धीरे तुम्हें ऑटो पायलट से बाहर निकाल देंगे। और यही इस किताब की सबसे प्रैक्टिकल एडवाइस है। तुम्हें परफेक्ट नहीं बनना क्योंकि परफेक्ट ह्यूमन एक्सिस्ट ही नहीं करता। तुम्हें बस अपने माइंड के डिफरेंट वर्जनंस
को पहचानना है। क्योंकि जिस दुश्मन को तुम पहचानते ही नहीं उसे हरा भी नहीं सकते और जिस ताकत को तुम पहचानते नहीं उसे इस्तेमाल भी नहीं कर सकते। अब इस पूरी बुक समरी को 30 सेकंड में रिवाइज करते हैं। पहला लेसन तुम एक फिक्स्ड पर्सनालिटी नहीं हो। तुम्हारे अंदर कई ह्यूमन टाइप्स रहते हैं। दूसरा हर सिचुएशन तुम्हारे अंदर किसी अलग वर्जन को एक्टिवेट करती है। तीसरा हर थॉट पर भरोसा मत करो क्योंकि तुम्हारा माइंड रियलिटी से ज्यादा स्टोरीज बनाता है। [संगीत] चौथा फियर तुम्हारा एनिमी नहीं है। उसे सही डायरेक्शन देना सीखो। पांचवा भीड़ हमेशा सही नहीं होती। पॉपुलर
होना करेक्ट होने का प्रूफ नहीं है। छठा तुम्हारी आइडेंटिटी एक इवेंट से नहीं बनती बल्कि उन स्टोरीज से बनती है जो तुम अपने बारे में रोज दोहराते हो। और सबसे आखिरी सबसे पावरफुल लेसन तुम्हें अपनी जिंदगी बदलने के लिए नया इंसान बनने की जरूरत नहीं है। तुम्हें सिर्फ सही समय पर अपने अंदर मौजूद सही इंसान को कंट्रोल देना सीखना है। और शायद यही वजह है कि इस किताब का नाम द टाइप्स ऑफ ह्यूमन रखा गया। क्योंकि सवाल यह नहीं है कि तुम कौन हो? सवाल यह है कि आज तुम्हारे अंदर कौन सा इंसान जीत रहा है? अगर इस वीडियो ने तुम्हें खुद को थोड़ा भी बेहतर समझने में
मदद की तो इसे सिर्फ लाइक करके मत निकल जाना। नीचे कमेंट में एक बात जरूर लिखना मेरे अंदर सबसे ज्यादा कौन सा ह्यूमन टाइप एक्टिव रहता है। [संगीत] क्योंकि कई बार चेंज सिर्फ अवेयरनेस से शुरू होता है। और अगर तुम ऐसी ही साइकोलॉजी, सेल्फ इंप्रूवमेंट और लाइफ चेंजिंग बुक्स की डीप समरीज चाहते हो तो चैनल को सब्सक्राइब करना मत भूलना। मैं मिलता हूं अगली वीडियो में। [संगीत]
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